शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

“आधुनिक आदमी”

इस खबर से उस खबर भागती रहती है ये जिंदगी
दिन और रात के फासले को पाटता रहता है मन
ख़ूनी सड़कें, ख़ौफ से डरी आँखों का दर्द
‘आधुनिक’ हो चुका ये मन मेरा, नहीं पसीजता किसी घटना से
कभी दूसरों के लहू से व्याकुल हो उठने वाला
अब नरसंहारों को भी ‘ न्यूज़ ‘ ही कहता है
पशुओं को देव-तुल्य कहने वाला अब
इंसानों को पशु-तुल्य भी नहीं समझता है
बाढ, सूखा, आत्महत्याएँ, विरोध-प्रदर्शन: जीवन के अब सामान्य पहलु से हो चले
डरता हूँ कहीं आधुनिक्ता इतनी ना बढ जाए
नर-पिशाच विशेषण, नाम के साथ जुड़ जाए।

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