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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

भाषा के साथ संस्कार भी बदलते हैं: राहुल देव


नई दिल्ली, 24सितंबर: भारतीय जन संचार संस्थान में ‘हिन्दी का भविष्य बनाम भविष्य की हिन्दी’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में देश के जाने-माने संपादकों ने अपने विचार रखे। सी.एन.ई.बी न्यूज़ चैनल के सीईओ और प्रधान संपादक राहुल देव, नई दुनिया के राष्ट्रीय संपादक मधुसूदन आनंद, दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग और आज़तक के समाचार निदेशक क़मर वहीद नक़वी इस मौके पर उपस्थित थे। हिन्दी के भविष्य को लेकर इनमें से कुछ चिंतित थे तो कुछ उम्मीदों से भरे हुए दिखे। संगोष्ठी की अध्यक्षता संस्थान के वरिष्ठ शिक्षक प्रो.के.एम.श्रीवास्तव ने की और संचालन हिन्दी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ.आनंद प्रधान ने किया।
बीज वक्तय रखते हुए सी.एन.ई.बी न्यूज़ चैनल के सीईओ और प्रधान संपादक राहुल देव ने ख़तरे की घंटी बजाई। उनका कहना था कि अगर हिन्दी की यही हालत रही तो 2050 तक भारत लिखने और पढने के सारे गंभीर काम अंग्रेज़ी में कर रहा होगा और हिन्दी सिर्फ मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी। उन्होनें कहा कि किसी भी भाषा के बदलने से उस भाषा को बोलने वालों के संस्कार भी बदलते हैं। राहुल देव की बात को निराशाजनक बताते हुए नई दुनिया के राष्ट्रीय संपादक मधुसूदन आनंद ने कहा कि बदलते समय और तकनीक के साथ हिन्दी को भी बदलना ही होगा वरना इसे खत्म होने से कोई नही बचा पाएगा। उन्होनें कहा कि अगर अंग्रेज़ी के कुछ शब्द हिन्दी में आ रहे हैं तो उन्हें रोकना नही चाहिए।
इस अवसर पर दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि भविष्य में वही हिन्दी चलेगी जो सरल होगी और आसानी से समझ में आने वाली होगी। उन्होनें कहा कि अंग्रेज़ी के शब्दों के आने से उसका वर्चस्व नहीं हो पाएगा बल्कि उससे हिन्दी और समृद्ध होगी। भविष्य की हिन्दी पर अपने विचार रखते हुए आज़तक के समाचार निदेशक क़मर वहीद नक़वी ने कहा कि भाषा में बदलाव और शब्दों का लेनदेन स्वभाविक है। उन्होनें इस बात को एक हद तक सही बताते हुए कहा कि भाषा का बदलाव ऐसा नही होना चाहिए कि उसके संस्कार ही खत्म हो जाए। उन्होनें कहा कि भाषा को पानी की तरह होना चाहिए, उसे जिस बरतन में रखा जाए उसी का रूप ले ले। संगोष्ठी का समापन प्रश्नकाल के साथ हुआ जिसमें इन संपादकों ने संस्थान के विधार्थियों के प्रश्नों के उत्तर दिए।

शनिवार, 19 सितंबर 2009

मीडिया है कठपुतलि नहीं

मीडिया वो सशक्त माध्यम है जो एक आम आदमी की आवाज़ को बुलंद करता है। हमारे देश में प्रेस की स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों का ही एक हिस्सा है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि हाल के कुछ वर्षोँ में जहाँ मीडिया ने कुछ अच्छे काम किए वहीं कुछ शर्मसार करने वाले मुद्दों का भी ये जनक रहा है। कई ऐसे सवाल हैं जो मीडिया की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सरकार ये निर्धारित करे कि मीडिया को क्या दिखाना चाहिए और क्या नहीं।
दरअसल, जब भी मीडिया को नियंत्रित या अनुशासित करने का मुद्दा सामने आता है, यह भुला दिया जाता है कि नियंत्रण का प्रावधान तो हमारे संविधान में ही है। संविधान में स्वतंत्रता की अन्य किस्मों की ही तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी निरंकुश नहीं छोड़ा गया है। उस पर लोक व्यवस्था, शिष्टाचार, कदाचार, राज्य की सुरक्षा आदि के हित में अंकुश लगाने की व्यवस्था है। ये सभी शर्तें मीडिया पर भी लागू होती हैं। मीडिया के किसी भी प्रतिनिधि ने यह दावा नहीं किया है कि हम संविधान और कानून से ऊपर हैं। फिर मीडिया पर अलग से नियंत्रण लागू करने की बात सोची या कही ही क्यों जाती है?
अगर मीडिया से उसकी वही स्वतंत्रता ही छीन ली जाएगी, जिसके लिए वह जाना जाता है, तो उसका अस्तित्व ही कहाँ रह जाएगा। सरकार अगर अपने मनमाफिक ढगं से मीडिया पर अंकुश लगाने लगी तो गलत कामों की निंदा कौन करेगा? इसलिए बजाए इसके कि सरकार मीडिया के काम में हस्तक्षेप करे, उसे मीडिया को खुद को नियंत्रित करने के लिए बाध्य करना चाहिए। संवेदनशील मुद्दे जैसे हत्या, बलात्कार आदि में कुछ हदें तय की जानी चाहिए जिसकी अवहेलना करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। मीडिया पर सरकारी पाबंदी लगाना बिलकुल भी जायज़ नहीं है। हम आज भी लोकतंत्र में जीते हैं और जबरन कोई भी कानून नहीं थोपा जाना चाहिए। मीडिया को भी खुद को नियंत्रित और संचालित करने की ज़रूरत है। वरना यह टकराव बार-बार उभरता रहेगा और इससे मीडिया की छवि पर धब्बा लगेगा। एक बात तो आज मीडिया को भी नहीं भूलनी चाहिए की स्वतंत्रता अगर हदों को पार कर जाए तो उछ्छृँख्लता कहलाती है।